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Tuesday, December 11, 2012

हस्तक्षेप जारी हे

हस्तक्षेप जारी हे                                             
डॉ राजेश शर्मा                   
                                                                    
हस्तक्षेप जारी हे
गहरी नींद में सोने वालों
आओ देखो उनको
जिनकी आखों में
नींद का एक कतरा भी नहीं ,
जिनकी नींद के सारे हिस्से
चुरा लिए हे तुमने
लाखों ,करोडो की नींदों को
तुमने भर लिया हे
अपने स्वर्ण रथ पर
और तेज़ी से हाँकते हुए
दौड़ा रहे हो उसे राजपथ पर
राजा की उस नींद के लिए
जिसकी पैरवी
संसद के पिछले सत्र में हुई थी ,
गाँवो ,बीहड़ो ,शेहरों ,प्रान्तों की
नींदे लादते लादते
कुछ नींदे गिर गयी
रथ के पहियों के नीचे
तुम्हे विदा करने वाले
तुम्हारे बिलकुल ख़ास लोग
रथ के रवाना होते ही
उन नींदों को उठा लाये
और खुद भी सो गए ,
मैने कहा कि
हस्तक्षेप जारी हे
तुम्हारा भी और हमारा भी
जहाँ जहाँ से तुम
नींदें बुहार के ले गए हो
वहाँ अब
आँखें खुली हे .


Thursday, December 6, 2012

एक नयी नज़्म
राजेश शर्मा

खुदाया क़र्ज़ किया हे मैंने इस ज़िन्दगी का हिसाब
किस किस रंग में आयेगें मेरे ब्याज के हिसाब ,
न ईमान ,न ज़मीर ,न वफ़ा रखी उधार
पर हर सिम्त में बहती रही मेरे लहू की धार ,
यारा मै किस तरह होता अपनी जिंदगी का बादशाह
बचपने से ही दोयम था बनते रहे और सरकार ,
तालीम ,तबीयत, तबर्रुक कुछ भी न था हासिल
हासिल था तो वो दो म्यान वाली तलवार ,
हिज्जे ,धज्जी या फिर चिन्दी सी उडाई हे जिंदगी ,
हर सालगिरह पर अपने चमकीले खिलोनों की तरह ,


Monday, December 3, 2012

अपने अतीत का परछाहा कहाँ छोड़ आओगे
जहाँ भी जाओगे काँधे पर लादे चले जाओगे .

Sunday, December 2, 2012

हर साथ में न बन सका मेरी सांसो का ये सिलसिला 
इन सिलसिलों को आवाज़ दो मेरी ज़िन्दगी को संभाल लो,
गज़ब हुआ उम्र का सफ़ा गिरा न इसपे कुछ सियाह 
सुफेदी से जरा उबार लो मेरी जिंदगी को संभाल लो 
ये जुबान की है जो सिलवटें ,मेरी बात खाये करवटें 
इन सिलवटों को निकाल दो ,मेरी जिंदगी को संवार दो




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