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Sunday, June 30, 2019

कविता

क्या कर रहे हो आजा आई बहार दिल है बेकरार

Thursday, January 3, 2013

सोनल पाण्डेय की पेंटिंग पर तवरित टिपण्णी 

मै रही उम्र भर हिज़ाब में ए खुदा
मेरी बेटी की आँखों में भविष्य के सपने हे,
वो ताकती हे मेरी ओर
की जियेगी क्या मुझ जैसा जीवन,
बैठी हे मेरी गोद में अपने वजूद के साथ
अपनी गुदगुदी नन्ही टांगो के साथ
आशंकित हो रही हे इस समाज से
जिसने दामिनी की टांगो को रक्त से भर दिया
इस समाज में बड़ी होने से डर रही हे वो
मेरे खुदा इसे बचा ,इसके सपनो को बचा ,
इसके समय को बचा ,इसके समाज को बचा


Wednesday, January 2, 2013


निशब्द हें शब्द
मौन आराधना में
गहरे संताप में
या फिर
कड़ियों के बनने और बिखरने के बीच
वायेविये से
ज्यो दूब पर ठहरती हे ऒस
और किनारे धकेलती जाती हे धुल को
प्रिज्म में तिरछी होती जाती किरण के
बदल बदल उठते हे रंग
झुकता सा लगता हे आसमान
धूसर पपड़ाये होठों पर
सूखी जबान फेरती हे मजदूरन
उसकी कांख में भी हिलता हे
कोई सूखाजीव निशब्द सा
लास्लासये तरल सा गुबार
भ्रम पैदा करता हे
प्रिज्म की किरण को इस्थिर नहीं होने देता
कड़ियों के बनने और बिखरने  के बीच
वायेविये सा कुछ
शब्द लेकिन जिन्दा होते हे
उलीचते हे स्वम को भीतर से बाहर
ज्योति पुंज से लगातार
शब्द होना ही स्थति का होना हे
निशब्द होना स्थति भर .

डॉ. राजेश शर्मा

Tuesday, January 1, 2013


नए साल में नयी बातें,
नए अदब से होंगी मुलाकाते
रखिये अपनी सोच में हमारे वजूद को
अंतरंगता में ही होंगी सच्ची मीठी बातें
अब तक जो आपने पढ़ा 

Tuesday, December 11, 2012

हस्तक्षेप जारी हे

हस्तक्षेप जारी हे                                             
डॉ राजेश शर्मा                   
                                                                    
हस्तक्षेप जारी हे
गहरी नींद में सोने वालों
आओ देखो उनको
जिनकी आखों में
नींद का एक कतरा भी नहीं ,
जिनकी नींद के सारे हिस्से
चुरा लिए हे तुमने
लाखों ,करोडो की नींदों को
तुमने भर लिया हे
अपने स्वर्ण रथ पर
और तेज़ी से हाँकते हुए
दौड़ा रहे हो उसे राजपथ पर
राजा की उस नींद के लिए
जिसकी पैरवी
संसद के पिछले सत्र में हुई थी ,
गाँवो ,बीहड़ो ,शेहरों ,प्रान्तों की
नींदे लादते लादते
कुछ नींदे गिर गयी
रथ के पहियों के नीचे
तुम्हे विदा करने वाले
तुम्हारे बिलकुल ख़ास लोग
रथ के रवाना होते ही
उन नींदों को उठा लाये
और खुद भी सो गए ,
मैने कहा कि
हस्तक्षेप जारी हे
तुम्हारा भी और हमारा भी
जहाँ जहाँ से तुम
नींदें बुहार के ले गए हो
वहाँ अब
आँखें खुली हे .


Thursday, December 6, 2012

एक नयी नज़्म
राजेश शर्मा

खुदाया क़र्ज़ किया हे मैंने इस ज़िन्दगी का हिसाब
किस किस रंग में आयेगें मेरे ब्याज के हिसाब ,
न ईमान ,न ज़मीर ,न वफ़ा रखी उधार
पर हर सिम्त में बहती रही मेरे लहू की धार ,
यारा मै किस तरह होता अपनी जिंदगी का बादशाह
बचपने से ही दोयम था बनते रहे और सरकार ,
तालीम ,तबीयत, तबर्रुक कुछ भी न था हासिल
हासिल था तो वो दो म्यान वाली तलवार ,
हिज्जे ,धज्जी या फिर चिन्दी सी उडाई हे जिंदगी ,
हर सालगिरह पर अपने चमकीले खिलोनों की तरह ,