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Wednesday, January 2, 2013


निशब्द हें शब्द
मौन आराधना में
गहरे संताप में
या फिर
कड़ियों के बनने और बिखरने के बीच
वायेविये से
ज्यो दूब पर ठहरती हे ऒस
और किनारे धकेलती जाती हे धुल को
प्रिज्म में तिरछी होती जाती किरण के
बदल बदल उठते हे रंग
झुकता सा लगता हे आसमान
धूसर पपड़ाये होठों पर
सूखी जबान फेरती हे मजदूरन
उसकी कांख में भी हिलता हे
कोई सूखाजीव निशब्द सा
लास्लासये तरल सा गुबार
भ्रम पैदा करता हे
प्रिज्म की किरण को इस्थिर नहीं होने देता
कड़ियों के बनने और बिखरने  के बीच
वायेविये सा कुछ
शब्द लेकिन जिन्दा होते हे
उलीचते हे स्वम को भीतर से बाहर
ज्योति पुंज से लगातार
शब्द होना ही स्थति का होना हे
निशब्द होना स्थति भर .

डॉ. राजेश शर्मा

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