एक नयी नज़्म
राजेश शर्मा
खुदाया क़र्ज़ किया हे मैंने इस ज़िन्दगी का हिसाब
किस किस रंग में आयेगें मेरे ब्याज के हिसाब ,
न ईमान ,न ज़मीर ,न वफ़ा रखी उधार
पर हर सिम्त में बहती रही मेरे लहू की धार ,
यारा मै किस तरह होता अपनी जिंदगी का बादशाह
बचपने से ही दोयम था बनते रहे और सरकार ,
तालीम ,तबीयत, तबर्रुक कुछ भी न था हासिल
हासिल था तो वो दो म्यान वाली तलवार ,
हिज्जे ,धज्जी या फिर चिन्दी सी उडाई हे जिंदगी ,
हर सालगिरह पर अपने चमकीले खिलोनों की तरह ,
राजेश शर्मा
खुदाया क़र्ज़ किया हे मैंने इस ज़िन्दगी का हिसाब
किस किस रंग में आयेगें मेरे ब्याज के हिसाब ,
न ईमान ,न ज़मीर ,न वफ़ा रखी उधार
पर हर सिम्त में बहती रही मेरे लहू की धार ,
यारा मै किस तरह होता अपनी जिंदगी का बादशाह
बचपने से ही दोयम था बनते रहे और सरकार ,
तालीम ,तबीयत, तबर्रुक कुछ भी न था हासिल
हासिल था तो वो दो म्यान वाली तलवार ,
हिज्जे ,धज्जी या फिर चिन्दी सी उडाई हे जिंदगी ,
हर सालगिरह पर अपने चमकीले खिलोनों की तरह ,




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